Чайковская отрывок из романа

        Если  бы  не  голод,  он  попытался  бы  заснуть  снова,  и  спал  бы  еще  и  еще. Непривычное  чувство,  можно  сказать  почти  незнакомое. Чего-чего,  а  еды  ему  всегда  хватало. Его  всегда  кормили,  с  кем  бы  он  ни  жил, с  родителями,  с  женой,  с  сестрой. О  нем  всегда  заботились.  В  сущности,  он -  необычайно  долго  живущая  собака,  коих  кормить  заведено, если,  конечно,  хозяева  приличные. И  тут  ему  грех  жаловаться,  доставшиеся на  его  долю  все  были  полны  решимости  исполнить  свой  гуманный   долг.  Вот  же  еда  -  на  тумбочке. Серая  лепеха  овсяной  каши  с  еще  не растаявшим  куском  масла.  Но,  как  до  нее  дотянуться?  Как  минимум,  надо  приподняться,  оторвать  спину  от  матраца. Об  этом  не  может  быть  и  речи, сейчас  это  все  равно,  что  вырвать  штангу.                  
-  Проснулся? -  парень,  у  которого  из  повязки  торчали  спицы, здоровой  рукой  взял  с  подоконника  пачку  «Беломора»,  ловко  вытряхнул  на  одеяло  одну  папиросу  и,  взяв  спички,  направился  к  двери.  -  Живой,  -  кивнул  он  упитанному  детине,  сидевшему  на  койке,  держась   руками  за  «балканскую  раму».
-  Как  дела?  -  спросил  тот  насмешливо. -  Ну,  выступил  ты  сегодня  ночью…
-  Он  больше  не  будет, -  сказал  парень  со  спицами. -  Верно? С  кем  не  бывает.
-  Вот  так  посмотришь,  как  люди  мучаются,   и  сам  пить  бросишь.
-  Может,  покурить  хочешь?  Тебя,  как  зовут?
-  Жак.
-  А-а…  Так  ты  что ,  не  русский?
-  Позовите  мне  сестру.  Нет,  санитарку.  Ели  вам  не  трудно.
    Парень  вышел.  Бугай  на  вытяжении  откинулся  на  подушки,  повернулся  набок,  порылся  в тумбочке  и  достал  журнал. Дед  лежал  тихо,  наверное,  спал.
    За  окном  лил  дождь. Какая  редкость -  дождь  в  декабре! Может,  дождь  помешал  бы  ему  вчера.  Может,  его  отвлек  бы  шум  ливня  или  прикосновение  долетающих  до  лица  прохладных  капель,  когда  он  распахнул  окно  на  лестничной  площадке.  Он  обтер  бы  лицо  ладонью,  ощутив,  как  оно  горит. Вчера  ему  не  доставало  именно  прикосновения  к  себе.  Дождя,  руки…чего  угодно,  дающего  превращение  из  субъекта  в  объект. Ему  нужно  было  отстраниться  от  себя, стать  чужим  себе. Он  ведь  давно  понял,  что  «голос»,  приходивший  извне -  это  он  сам. Одного  он  не  мог  понять -  как  это  происходит,  техническая  сторона  дела  оставалась  для  него  загадкой.  Зато  мотив был  ясным…   Говорят,   что  когда  коллегам  разрешили  навестить  Ландау  поле травмы, и они  спросили  о его  самочувствии,  тот  в  шутку  ответил: «Ландау  я  уже  конечно  не  буду…  Но  Зельдовичем-то    смогу».   Он,  конечно,  не  Ландау,  но  для  него  невозможность  быть  прежним  означала  невозможность жить  дальше. Он  не  мог  согласиться  на  снижение  уровня. Видит  бог, он  не  стал  меньше  любить  жизнь, но  выносить  свое,  все  возрастающее ,  неучастие  в ней,  он  не  мог.
    Может, то,  что  случилось  с  ним   в  результате   аварии  у  Щитовой,  было  просто  сконцентрированным  итогом  того,  что  иначе  растянулось  бы  на  долгие  годы.  Окружающая действительность  постоянно  отторгала    его,  а  так  хроническое  отторжение  заменилось  острым,  одномоментным.  Так  какая  разница?  Он  все  равно  бы  жил  невостребованным. То, что  любил  он, было  не  интересно  и  не  нужно  другим,  и  наоборот. И  вот  это  наоборот,  он  особенно  не  принимал. Он  все  равно  продолжал  бы  жить,  как  вынужден  жить  нелегал  во  враждебной  стране  -  жить  по  легенде.  Так  что  мотив  у  него  самый  тривиальный,  юношеский    -  неразделенная  любовь. Только  к  неразделенной  любви  к  женщине  прибавилась  еще  неразделенная  любовь  к  жизни.
    Первое,  что  он  сделал  -  оборвал  все  связи  с  собой  прежним. Все,  что  было  с  ним  раньше  он  законсервировал  в  себе,  и  наложил  абсолютное  табу  на  какие  бы  то  ни  было  попытки  возвращения  к  прежней  жизни. Ни  разу  он  не  искал  встречи  с  Ирой, да  и  она  просто  пропала  сама  по  себе,  и  очень  может  быть,  что  ей до  сих   ничего  не  было  известно  о  его  драме.  Для  нее  он  просто  растаял  и  все,  не  вернулся. По  другому  и  быть  не  могло.   Из  старых  друзей  он  ни  с  кем  не  хотел  встречаться, не звонил  Каре, не  отвечал  на  письма  Евдокимова,  игнорировал  приглашения  на  традиционные  институтские  сборы…    Один  только  раз    позволил  себе  нарушить  правило…   Возвращаясь  из  сочинского  санатория,  дал  телеграмму   в  Горловку -  может,  ребята  смогут  подойдут  к  поезду. Сомневался…   На  перроне  его  ждали  Староческуль  и  Павловский.   В  руках  у  Павловского  была  огромная  сумка,  с  которой  он  сразу   полез   в  вагон.
-  Витя, поезд  две  минуту  стоит.
-  Так   залезай,  а  то   еще  останешься.
Они  проехали  с  ним  часа  два ,  не  меньше.  Поили  горилкой  все  купе  и  вспоминали,  вспоминали…  Сошли   уже  где-то  в  Артемовске.   Чокнутые…
    Вчера  он  еще  мог  подняться  по  лестнице,  вчера  еще  были  ноги,  а не  цементные  трубы. На  пятом, верхнем  этаже  не  смог  открыть  окно  -  намертво  заело  ржавый  шпингалет. Пришлось  спуститься  на  этаж  ниже. Неловко  взобрался  на  подоконник,  подставив  бачок  с  пищевыми  отходами,  опираясь  одной  ногой  на  крышку,  вдавливая  ее  в  месиво  картофельной  кожуры. Нарочно  заставлял  себя  не  смотреть  вниз,  ни  к  чему  загружать  воображение  лишней  информацией  -  это  могло  удержать  его  от  задуманного. «Но  жалок  тот,  кто  смерти  ждет,  не  смея  умереть. Так  весело,  отчаянно  шел…». Бросился  вниз  поспешно,  отчаянно,  но  инстинкт  трусости  все-таки  взял  свое , прыгнул,  как  нырял  всегда  - «солдатиком»,  с  закрытыми  глазами -  слабак.  И,  падая, вот  в  эту  самую  секунду,  -  и  это  главное  -  не  пожалел.
-  Кто  меня  звал?
   Он  вздрогнул,  ощутив  как  его  царапнул  хриплый  голос. Дряблое,  сплошь  морщинистое  лицо  склонилось  над  ним. Давно  пропитые  глаза  смотрели   куда-то  сквозь  него,  взглядом  слепого. Он  разобрал,  что  лицо  принадлежит  женщине,  это  подтверждала  повязанная  на  голове  косынка. Когда-то  это  лицо  было  красивым. Создание  из  отверженных.
-  У  меня  две  просьбы. Вы  не  могли  бы  поднять  головной  конец  кровати  и…покормите  меня.
-  Сейчас,  ласточка,  сейчас.  А  чего  же  засранки  эти  не  покормили? - она  имела  в  виду  медсестер.  - Ведь  каждая  тридцать  процентов  санитарских  получает,  -  хрип  ее  был  монотонным  и скорым.  Продолжая  ругать  медсестер,  она  нагнулась  к  торцу  койки,  где  имелись  рукоятки,  изменяющие  положение  матраца,  попробовала  покрутить  их,  и  выяснилось,  что  ни  одна  не  работает.
-  Нет,  ласточка, тут  что-то  сломано,  -  раскрасневшись  от  усилий,  она  выпрямилась,  даже  в  этом  кратком  движении  неуверенно  владея  своим  телом. Потом  она  покормила  его  с участливой  печалью  во  взоре и ,  глухо  матерясь,  ушла  из  палаты. Двигалась  она,  как  сломанная  марионетка.
    Потом  пришла  сестра,  сделала  обезболивающий  укол  -  и  вовремя,  он  уже  не  мог  терпеть.  Сделал  из  себя  чахохбили… Не  хватает  только  приправы,  красного  соуса.  «Blut  ist  ganz  besonders  Saft».   Вряд  ли  Гете  подразумевал  нечто  гастрономическое, хотя  для  этих  целей  она  тоже  годится,  как  показывает современность.  Совсем  особый  сок…Кровь - это  не  просто  материальный  символ  жизни, кровь -  ее  оккультная  сторона.  Кровь -  индикатор  угрозы,  поломки. Бесценный  «вещдок»  для  криминалистов, капля  крови  может  сыграть  решающую  роль при  вынесении  приговора. С  ее  помощью  можно  идентифицировать  родство,  исключить  отцовство. Свидетели  Иеговы  предпочтут  умереть  от  кровотечения, чем  согласиться  на  переливание  крови.  Но  главное  в  другом…  Привыкая  к  виду  крови,  человек  преступает  «нравственный  закон  внутри  себя»  и  после  этого  надлома  продолжает    жить  уже  вне  этики,  со  всеми  вытекающими  из  этого  последствиями. Это  почище  первородного  библейского  грехопадения. Первое жертвоприношение богу  и  есть  самый  страшный  грех. «Не  убий»…
    Вчера  он  неправильно  выбрал  место. Ему  следовало  прийти  с  этим  на  Чайковскую. Его  бы  никто  не  узнал,  соседи, наверняка,  все  сменились, никто  бы  не  помешал. Это  было  бы  справедливо. Этажи  там  высокие, окна  лестницы  выходят  во  двор. Ему  там  было  бы  легче  во  всех  отношениях,  а  он  упустил  возможность  замкнуть  круг. Дом,  откуда  все  они  произошли, где  все  они  один  единственный  раз  жили  вместе  одной  семьей. Пусть  недолго,  но  никогда  потом  они  уже  не  соберутся  под  одной  крышей. Никогда. И  каждый  из  них  потеряет  от  этого.
    Он  не  мог  простить  Миле,  что  она  поменяла  эту  квартиру  и  тем  лишила  его  возможности  приходить  сюда. Пусть  это  желание  возникало  раз  в  год,  раз  в  три  года, но  у  каждого  из  них,  как  он  считал,  должна  была  оставаться  эта  возможность. Как  она  смогла  пойти  на  это,  и  разве  ей  не  захочется  когда-нибудь,  как  ему  сейчас,  броситься  туда,  барабанить  кулаками  в  дверь,  ворваться  в  слезах  и, ненавидя  тех,  кто  сейчас  там  живет  только  за  то,  что  они  там  живут,  закричать  им : «Убирайтесь  отсюда!  Это  наш  дом,  наш!  Здесь  дед  мой  умер. Сюда  отец  с  фронта  пришел  за  мамой.  Я  отсюда  в  школу  пошел,  меня  здесь  от  воспаления  легких  спасли. Убирайтесь!».  Все…сейчас  опять  сорвешься  в  истерику, запросишь  укол… Остановись, пусть  высохнет   едкая  глазная  влага.  …А  Мила  не  виновата, что  отдала  это  за  лишние  десть  метров, за  горячую  воду, за нормальную  ванную  и  туалет. Виновата  не  больше,  чем  все  они,  которые еще  раньше  бросили  эту  квартиру,  разъехавшись  кто  куда.
    Дом  занимал  целый  квартал.  Однообразный  светло-бежевый  фасад,  ровный,  без  балконов,   с  долгими  параллельными  рядами  высоких  окон  тянулся  от  улицы  Фурманова  до  Фонтанки. Во  времена  его  детства  у  Фонтанки  напротив  Летнего  сада  причаливали  рыбацкие  лодки,  швартуясь за  кольца  вмурованные  в  гранитные  стены  набережной  над  водой. Деревянные  мережи,  связанные  в  цепочку,  плавали  за  кормой  или  громоздились  на  дне  лодки. Прямо  с  лодок  у  рыбаков  можно  было  купить  миног,  корюшку. Странно  было  видеть  скопление  рыбацких  лодок  рядом  с  Летним  дворцом  Петра,  хотя  ведь именно  так  -  по  воде, прибывали  сюда  гости  на  ассамблеи.                                                         
    Кроме  парадного  подъезда  с  плоским  широким  крыльцом,  был  еще  черный  ход  со  двора  с  узкой  деревянной  лестницей  с  почерневшими  перилами,   настолько  узкой,  что  по  ней  можно  было  пройти  только  одному,  она   выводила   в  коридор  бельэтажа, откуда  выше  шла  главная  лестница.  Собственно  первого этажа у  дома,  построенного  в  девятнадцатом  веке  для  «придворных  служителей», не  было,  вместо  него  имелись  полуподвалы  с  низкими  окнами  прямо  над  асфальтом  тротуара.  Проходя  по  улице  можно  было  наблюдать у  себя   под  ногами   обставленные  примитивной  мебелью, тесные  комнатенки  вместе   с  ютящимися  там  людьми. Для  него  вид  этих  каморок  был  первым  свидетельством  социального  неравенства  в  обществе.
    Их  квартира  располагалась  на  втором этаже,  в  самом  конце  длинного  казематного  коридора, но  не  в  торце,  а  сбоку. Механический  звонок  на  двери…надо  было  вращать  ручку,  как  заводишь  будильник. Никто  уже  не  отворить  перед  тобой  эту  старую,  крепкую  дверь.
    И  он,  потерявший  все, почему-то  только  сейчас  открыл  счет  потерям  - это  первая. Как  будто  все  остальное  было  делом  поправимым,  а  тут  уж  точно  надеяться  не  на  что.  Ни  тех  голосов,  ни  лиц,  ни  запахов,  ни  прикосновений  не  вернуть, и  они  уже  никогда  не  возникнут  заново  не  только  в  его  жизни,  но  и  в  жизни  вообще, нигде  в  космосе. Он  - последняя  форма  их  существования,  последний  их  живой  отпечаток,  и  только  вместе  с  ним  они  уйдут  в  последнее,  абсолютное  небытие.
    …Крохотный  квадрат  прихожей,  завешанный  верхней  одеждой  десяти  человек,  так  что  не  видно  обоев. Когда  вешалки  не  хватало,  то  одежду  сваливали  там  же   на  сундук.  Налево - кухня, такая  же  маленькая  и  квадратная: эмалированное  корытце  рукомойника, газовая  плита  и  столик. Под  потолком  на  синей,  крашеной  стене  висит  газовый  счетчик,  похожий  на  гигантскую  консервную  банку; когда  надобность  в  них  отпадет  ими  будут  завалены  все  городские  дворы. В  массивный  каменный  простенок  между  прихожей  и  кухней  вделан  туалет  с  высоко  поднятым  цементным  полом. Все  пространство  занято  унитазом  с  бачком  с  цепочкой,  поворачиваясь  обязательно  заденешь  стены, неровные  и  сырые,  как  в  каземате.
    Вся  квартира  -  одна  большая  комната,  искусно  перегороженная  мебелью  на  спальные  ячейки. Вот,  при  входе,  кушетка  вдоль  стены  и  торшер - здесь  живет  дядя  Юра  со  своей  второй  женой,  тетей  Зиной. Он  недавно  вернулся  с  целины,  завербованный  на  уборочную  из  своего  таксопарка,  приоделся,  купил  проигрыватель,  что  стоит  на  стуле  у  изголовья  кушетки. Оттуда,  когда  дядя  Юра  приходил  навеселе, вечерами  звучала  остро  порочная  мелодия  бразильской  самбы: «Мама  йо  керо.  Мама  йо  керо.  Мама  йо  керо,  мама   йо…». Еще  запомнилась  польская…  «Тиха  вода…бжени  рве..» ,  странно  гармонировавшая  с  обстановкой  в  квартире,  с  красным  абажуром  над  круглым  столом  посреди  комнаты,  с  тинно - зелеными  листьями  фикуса  в  кадке, с  кружевными  навололчками  подушек  на  никелированных  кроватях, с  доносившимся  из  открытой  форточки  транспортным  шумом  улицы…   с  мирком  временно  осевших  в  этом  стесненном  пространстве  в  ожидании  новой,  более  комфортной,  жизни  людей,  связанных  между  собой  не  цепкими,  но  никогда  не  рвущимися узами  крови. «Тиха  вода…». Белый,  суконный  чехол  на  диване,  что  стоит  в  углу  у  окна.  Это  место  мамы. А  папа  в  Москве,  на  учебе,  на  Высших  академических  курсах ( в  последний  вечер  международного  фестиваля  молодежи  и  студентов  курсанты  военных  академий  будут  подняты  по  тревоге,  чтобы  обеспечить  выдворение  гостей  молодежного  форума,  и  за  одну  ночь  вывезут  всех. «Если  бы  парни  всей  земли…».).  Трехлитровая  банка  на  подоконнике,  с  затянутой  марлей  горловиной,  с  плавающим  внутри  мерзким,  замшелым  «грибом». Отпей  глоток  кисленького  и  двигайся  дальше  вдоль  стены. Между  окон  -  буфет. Уродливая  желтая  громадина,  ничем  не   интересная;  внутри  чашки, на  полке  вереница  слоников  из  лунного  камня, какие-то  склянки  с  сердечными  каплями…  Дальше за  буфетом  швейная  машина  «Зингер»  с  чугунной  решеткой  педали  ременного привода  и  золотым  сфинксом  на  черном, выпуклом  боку. Дальше  этажерка,  где  можно  найти  книги  Чарской, со  старым  шрифтом , еще  с  буквой  «ять». «Три  мушкетера»…  Ему  никогда  не  нравились  водевильные  интерпретации  романа. Там  все  серьезно. Особенно  первая  дуэль  у  Сент-Жерменского  аббатства. Предстоит  бой,  то  есть  дело  нешуточное,  и  бальзам  в  узелке  не  просто  так, и  солнце  в  глаза  некстати,  на  лице  улыбка,  а  в  крови  грусть  будто  наперед  знает,  чем  все  кончится  двадцать  лет  спустя.  А  как  гениален  Бикара  -  провел  шпагой  черту  на  земле:  «Здесь  умрет  Бикара»…  Серьезно. Со  смертью  не  шутят,  дудки.
    На  этажерке  стояла  высокая,  узкая  ваза  из  розового  стекла  с  высохшим  камышом, а   рядом  большая  статуэтка  античной  богини  в  ниспадающем  пеплуме,  вся  из  гладко  отполированного,  нежно-зеленого  камня. В  этом  же  углу  висят  бабкины  иконы  с  рубиновой  лампадкой,  светящейся,  как  кремлевские  звезды,  когда  ее  зажигали  в  темноте. В  семье,  кроме  бабушки, не  было  истово  верующих,  хотя  он  помнит,  как  мать  нет-нет  да  и  перекрестится  взаправду.  Сам  он  тоже  крещенный. В  Пантелеймоновской  церкви  на  улице  Пестеля. Он  уверен,  что  действительно  помнит  этот  момент  -  когда  его  опускают  в  купель,  а  он  боится  священника  в  золотой  рясе. Одно  мгновение,  но  точно  помнит.  Крестили  тайком  от  отца.  «Захотели  меня  партбилета  лишить» -  вспоминая, усмехнется  потом  отец. Одна  из  икон,  что  побольше, была  в  серебряном  окладе    в  футляре  под  стеклом. Лики  богоматери  и  младенца  мулатно -темны  и  полны  непонятной  ему  скорби. 
    А  вот  здесь  задержись. Вскарабкайся  на  высокий  матрац  кровати,  заберись  под  одеяло.  Ложе  просторное,  обычно  тебя  укладывали  спать «валетом» с  кем-нибудь,  чаще  с  дедом. Ночью,  если  долго  не  мог  заснуть, на  него  нагоняли  страх  отсветы  фар  проезжавших  по  Чайковской  машин  -  светящиеся  отпечатки  вытянутых  прямоугольников  окон,  как  по  арене  цирка,  пробегали  по  окружности   сводчатого  потолка,  как  будто  кто-то  шарил  прожектором  по  спящей  комнате. В  шесть  лет  это  не  трусость,  это  творчество  опасности. Когда  заболел,  кровать  перешла к  нему в  единоличное  пользование. Лечила  его  Юдина  -  залуженный  врач-педиатр  республики. Она  жила  неподалеку  в  угловом  доме  на  набережной  Кутузова  возле  горбатого  мостика  через  Фонтанку, когда  его  проезжаешь  на  машине  всегда  ухает  сердце,  проваливается,  не  поспевая  за  телом. Неприятное  ощущенье,   и  готовишь  себя  к  такому  же,  приближаясь  к  Лебяжьей  канавке  -  там  тоже  мостик-горка.  Юдина  велела  намазать  большую  тряпку  горчицей, завернула  его  в  эту  тряпку, накрыла  сверху  одеялом,  подушкой  и  еще  сама  навалилась  сверху,  а  была  она  теткой  дородной,  и  вот  под  этим  прессом  он  вопил,  чувствуя,  что  сгорает  заживо,  и  нет  никакой  возможности  освободиться. Когда  температура  спадала,  он  зачитывался, купленной  тогда  для  него  дедом,  книгой  Бианки,  героями  которой  были  затравленные  людьми  звери:  лось  Одинец,  рысь  Мурзук,  соболь…Потом  несколько  раз  ходили  к  Юдиной  на  дом,  она   забирала  у  мамы   кровь  из  вены  и  вводили  ему  в  ягодицу  -  гемотерапия.  В  одно  из  таких  посещений  он  видел  праздничный  ноябрьский  салют  над  Невой  из  окна  гостиной,  лежа  на  диване, когда  его  кололи.
    Другой  угол  комнаты  был  отгорожен   пестрой  занавеской  и  двумя  шкафами. Там  размещались  еще  два  спальных  места  -  плотно  загнанная  в  угол  деревянная  кровать  с  нагромождением  матрацов,  что  делало  ее  высокой  и  похожей  на  русскую  печь  -  там  спала  бабушка  или  дед, или  оба,  когда  как,   и  еще  одна  кушетка  вдоль  задних  стенок  придвинутых  друг  к  другу  платяных  шкафов  -  там  спала  Мила,  тогда  студентка  Педагогического  института. Наверное,  с  ней,  своей  двоюродной  сестрой, что  была  старше  его  на  двенадцать  лет,  связаны  его  первые  сексуальные  переживания,  когда  упросив  Милу  почитать  ему  перед  сном  Тома  Сойера,  забрался  к  ней  в  постель  и  лежа  за  ее  спиной,  касаясь  ее телом, не  понимал  отчего  это  так  приятно. Он  объяснял  это  тем,  что  Мила  добрая  и  хорошая. Мила  носила  косу, роскошную,  тяжелую;  отрезанная  -  она  долго  хранилась  в  нижнем  выдвижном  ящике  шкафа  вместе  с  какими-то,   облепленными  ракушками,  шкатулками и толстенными  пачками  облигаций  государственных  займов,  так  никогда  и  не  пригодившихся,  а  косу,  кажется,  потом  продали,  чуть  ли  не  на  Ленфильм?
    Итак  -  все  улеглись  по  своим  местам, семейный  осьминог, раскинув  по разным  углам  щупальцы, затих. Дед  ложился  спать  раньше  всех  -  часов  в  восемь,  но  и  вставал  ни  свет,  ни заря.  Как то  раз,  уже  поздним  часом, дядя  Юра  читал,  лежа  на  своей  кушетке,   при  свете  торшера,  а  все  уже  легли  и  дед  сказал,  чтоб  он  погасил  свет.  Дядя  Юра  не  послушался. Тогда  дед  слез  с  кровати,  прошел  в  трусах  через  всю  комнату  и  сам  выключил  свет. Когда  он  снова  лег,  в  притихшей  комнате  отчетливо  прозвучало    сказанное  дядей  Юрой  в  раздражении :  «Засранец».  Что  он  ощутил  тогда  -  ужас  стыда,  придавивший  его  к  постели  сильнее,  чем  грузная  докторша. Он  догадывался,  что  в  этом  не  было  искренней  злобы.  Но  и  в  любом  оправдании  это  поразило  его. Как  будто  патефонная  игла,  скрежеща,  соскочила  с  бороздки  пластинки, оборвав  пастораль,  которую  он  наивно  намеревался  слушать  всю  жизнь. Дед  никак  не  ответил,  смолчал…»прости  его,  ибо  не  ведает  он,  что  творит»,  а  ,может,  и  большая  мудрость  удержала  его  от  ответа  сыну.
    Он  не  помнит,  как  они  вернулись  из  Германии,  и  отсчет  новой  жизни  на  этой  квартире  для  него  начинается  с  отражения  в  зеркале  в  средней  створке  шкафа  -  он  с  коротко  остриженной  челкой  в  школьной  форме, только  что  купленной  в  ДЛТ. Все  новенькое -  гимнастерка, фуражка  с  кокардой, черный   ремень  и  пряжка  с  буквой  «Ш»,  которую  он  вечером  до  блеска  надраит  солидолом. Благоговейно  сложенная  на  спинке  стула  форма, отпаренная  мамой,  до  утра  сохранит  запах  утюга.   …Уроки  приходилось  делать  за  обеденным  столом,  единственным  и  общим  для  всех  в  квартире. Рядом  могла  заниматься  сестра,  наклеивать  на  картонные  полоски  фигурки  Емели,  воеводы…  для  настольного  театра. Дальше  по  окружности  стола  тетя  Зина,  разложив  инженерные  справочники,  вычерчивает  графики. Скудность  изображенного  -  тонкие  изломанные  линии  на  просторном, розоватом   листе  миллиметровки   казались  обидной  бессмыслицей. Другое  дело - красные  и  синие,  жирные  стрелы  на  папиных  картах  со  множеством  условных  обозначений:  танки,  артиллерия, полки,  нанесенные  с  помощью  специальной  линейки  с  вырезанными  трафаретами. Такая  карта  лежала  в  планшете,  в  отделении  из  прозрачной  пластмассы,  закрытом  суконной  шторкой,   там  было даже  специальное  гнездо  для  курвиметра. А  здесь  высвободили  место  за  столом,  чтоб  напоить  чаем  Милкиного  кавалера.  Застенчивый  молодой  человек,  высокий  и  курчавый,  как  Клиберн, математик. Чем  он  не  нравился  бабке  -  ведь  все  сделала,  чтоб  отвадить  его  от  Милы.
    Еще  стол  запомнился  праздниками. Вот  тут  привычка  деда  рано  вставать  была  особенно  кстати.  Накануне,  он  с  утра  обходил  магазины, выстаивал  в  очередях, добывая  деликатесы. Икра,  балык,  карбонат… «А  чего  не  хватит  в  доме  -  сколько  хочешь  в  гастрономе. Вай - вай  -  вай!» -  захлебывался  от  восторга  Канделаки.  Славная  песня,  и  ведь  все  святая  правда,  как  во  всякой  пропаганде. А ,  может,  не  только  тебе,  но  и  всем  вокруг  было  по  семь  лет…  За  столом  дед  с  отцом  спорили  о  политике. «Погоди, Вася,  дай  срок  -  еще  и  с  Китаем  придется  воевать» -  пророчествовал  дед.  И  ,  конечно,  об  антипартийной  группе  Молотова, Маленкова  и  Кагановича  с  примкнувшим  к  ним  Шепиловым. За  рюмкой  звучали  прибаутки  той  поры: «Водку  пью  для  аппетита  -  сказал  Броз  Тито;  Водку  пью  в  меру  -  Джавахарлал  Неру; Пью  водку  регулярно -  говорил  Сукарно»…  У  женщин  свои  темы -  дети,  деньги,  ломбард…
    Очередь  в  ломбард. Несколько  раз  он  стоял  с  мамой  в  этой  очереди,  всегда  длинной,  многочасовой.  Сначала  надо  было  ждать  открытия,  задолго  до  этого  на  улице  выстраивался  хвост  -  на  высоких  ступеньках  каменного  крыльца, вдоль  стены,  сворачивал  за  угол  и  снова  вдоль  стены. А  вокруг  теплынь, томительное  и  скучное  проклевывание  весны,  течет  с  крыш, солнце  нагревает  голый  асфальт,  зимнюю  меховую  одежду  и  пропахшие  нафталином  узлы  с  барахлом. Бывает,  надоест  человеку  стоять,  очередь  движется  еле-еле,  махнет  рукой  - а… в  другой  раз, -  из  этой  очереди  не  уходил  никто. Терпения  здесь  доставало  всем. Огороженная  железной  сеткой  камера  хранения, окошечко,  приемщик  выдергивает  из  отреза  нитку  и  поджигает  ее  спичкой…
    Где  же  находился  этот  ломбард?  Тогда  он  совсем  не  знал  города,  только  то, что  было  под  боком:  Летний  сад, Марсово  поле, Моховая…  «Пойдем,  Чимша, прошвырнемся»  -  так  его  звал  дядя  Юра,  никогда  не  добавляя  к  прозвищу  второй  части.  И  они  выйдут  в,  так  любимый  им, ленинградский мелкий  дождик,  в  фиолетовый  сумрак  улиц,  когда  огни  плоских  витрин  кажутся  значительными  сами  по  себе,  как  свет  века, как  классический  задний  план  для  маленького  суетливого  человека  в  черном  котелке. Влажный,  потемневший  асфальт  становится  гигантским  зеркалом  города,  отражая  все  его  огни. Они  зайдут  в  канцелярский  магазин  на  улице  Пестеля  и  дядя  Юра  купит  ему  крохотные   пластмассовые  счеты для  школы. Потом  пройдут  мимо  аптеки,  куда  он  спустя  десять  лет  побежит  за  кислородной  подушкой  и  на  обратном  пути  ему  придет  в  голову,  что  наполненная,  она  напоминает  волынку  или  мех  с  вином,  то  есть  что-то  связанное  с  радостью  жизни,  а  значит  все  будет  хорошо… Но ,  подходя  к  двери,  он  услышал,  как  воет  их  комнатная  собачонка;  деда  не  стало…
    Извини,  дядя  Юра. Не  догуляли.
    Дед  спутал  планы,  все  мысли…


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